भाकृअनुप - केन्द्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान
(आई0 एस0 ओ0 9001:2008 - प्रमाणित संगठन)
   
समाचार [View All]
1. स्व: चौ. चरण सिंह के जन्म दिवस के उपलक्ष्य मे “किसान सम्मान दिवस” एवं प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजन दिनांक 23.12.2016
(Update 26 Dec 16)


2. Additional Secretary (DARE) & Secretary (ICAR) and DDG (Agriculture Extension)
(visited on 20 Dec 16)


3. Advertisement for filling up Young Professional-I.
(Update 15 Dec 16)


4. List of Holidays Year 2017
(Update 17 Oct 16)


5. संस्थान मे 2 अक्टूबर, 2016 को स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सभी अधिकारियों एवं कर्मचारीयों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया।
(Update 4 Oct 16)


6. Kisan Gosthi and Animal Health Camp organised on 01.10.2016 at Kalanjari village (Update 3 Oct 16)

7. Kisan Gosthi and Animal Health Camp organized at Anjoli and Shoharaka village under Mera Gaon Mera Gaurav.
(Update 29 Sep 16)


8. केन्द्रीय गोवंश अनुसंधान संस्थान को किसान प्रदर्शनी मे प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ है।
(Update 10 March 16)


9. Rate of Screening of Genetic Diseases of Cattle

10. New rates of semen from 27.3.2015
संस्थान में संचालित परियोजनाओ का संक्षिप्त विवरण
I.गाय की संकर प्रजाति का विकास
फ्रीजवाल परियोजना
विभिन्न 37 सैन्य फार्मों पर 31 दिसंबर 2013 को फ्रीजवाल प्रजाति की 18047 मादाएं उपलब्ध थीं जिनमें 10293 वयस्क गायें, 5987 वृद्धिशील मादाएं व 1767 बछड़ीयां थीं। सैन्य फार्म अम्बाला पर सर्वाधिक 1891 फ्रीजवाल मादाएं उपलब्ध थी जबकि पिम्परी सैन्य फार्म पर यह संख्या 1541 व मेरठ सैन्य फार्म पर 1141 थी। विभिन्न सैन्य फार्मों पर संभ्रांत मादाओं की संख्या 951 थी। मेरठ सैन्य फार्म पर 96 संभ्रांत मादाएं थी जबकि अम्बाला व लखनऊ सैन्य फार्मों पर यह संख्या क्रमश% 92 व 76 थी।

मेरठ स्थित सांड पालन इकाई पर भविष्य में अच्छे सांड बनाने के उद्देश्य से देश के 29 विभिन्न सैन्य फार्मों से संभ्रांत संगम से उत्पन्न कुल 1121 बछड़े भेजे गए। सैन्य फार्म अम्बाला द्वारा सर्वाधिक 269 फ्रीजवाल बछड़ों की आपूर्ति की गई जबकि सैन्य फार्म मेरठ व पिम्परी द्वारा क्रमश% 203 व 145 बछड़े भेजे गए। अप्रैल 2013 से मार्च 2014 तक कुल 100 बछड़े सांड पालन इकाई पर भेजे गए।

वीर्य हिमीकरण प्रयोगशाला पर अब तक हिमीकृत वीर्य की 2867150 मात्राओं का उत्पादन किया जा चुका है। जिसमें से 1107870 मात्राएँ विभिन्न सैन्य फार्मों व क्षेत्र संतति परियोजना व राष्ट्रीय कृषि नवोन्मेषी परियोजना के विस्तार कार्यक्रम के अंतर्गत बांटी जा चुकी हैं, जिसमें वर्ष 2013 में सैन्य फार्मों को दी गई 70,733 मात्राएँ भी सम्मिलित हैं। इस अवधि में हिमीकृत वीर्य की 25680 मात्राएँ बेची भी जा चुकी हैं।

फ्रीजवाल गायों में प्रथम ब्यांत पर आयु का माध्य 978.71 दिन था। प्रथम ब्यांत आयु पर फार्म, मौसम व जन्म वर्ष का महत्वपूर्ण प्रभाव था। संसेचन काल, शुष्क काल व ब्यांत अंतराल का न्यूनतम वर्ग माध्य क्रमश% 148.45, 107.59 व 426.64 दिन था। संसेचन काल, शुष्क काल व ब्यांत अंतराल का न्यूनतम वर्ग माध्य क्रमश% 148. 45, 107.59 व 426.64 दिन था। सेसेचन काल, शुष्क काल व ब्यांत अंतराल पर फार्म, प्रसविता, मौसम व जन्म वर्ष का महत्वपूर्ण प्रभाव था। तीन सौ दिनों का दुग्ध उत्पादन (MY300), कुल दुग्ध उत्पादन (TMY), उच्चतम उत्पादन (PY) व दुग्धकाल (LL) का न्यूनतम वर्ग माध्य क्रमश% 3262.90 किग्रा., 3307.09 किग्रा., 15.06 किग्रा. 328.36 दिन था। इन गुणों पर फार्म, प्रसविता, मौसम व जन्म वर्ष व प्रथम ब्यांत पर आयु का महत्वपूर्ण प्रभाव था। सैन्य फार्म महु पर फ्रीजवाल गाय से तीन सौ दिनों में सर्वाधिक दुग्ध उत्पादन (4018.52 किग्रा.) हुआ जबकि लखनऊ व इलाहाबाद सैन्य फार्मों पर पाली गई फ्रीजवाल गायों द्वारा तीन सौ दिनों में क्रमश% 3808.63 किग्रा. व 3750.00 किग्रा. दुग्ध उत्पादन प्राप्त हुआ।

पैत्रिकता आंकलन का मान प्रथम ब्यांत पर आयु (0-056±0-11), कुल दुग्ध उत्पादन (0-064± 0-009), 300 दिनों का दुग्ध उत्पादन (0-048±0-009) तथा उच्चतम दुग्ध उत्पादन (0-065± 0-009) कम था। संसेचन काल, शुष्क कालव ब्यांत अंतराल का पैत्रिकता आंकलन भी कम था। (0-007 ± 0-005] 0-003 ± 0-005 और 0-007± 0-005)। साधारणतया सभी गुणों के पैत्रिकता आंकलन में मानक त्रुटि कम थी।

संतति की प्रथम ब्यांत में 300 दिनों के दुग्ध उत्पादन के आधार पर कुल एक सौ पांच (105) सांडों का आनुवंशिक गुणों के लिए मूल्यांकन किया गया। सर्वोच्च दस सांड, झुण्ड औसत (2818 किलोग्राम) से 87.25-175.81 किग्रा. (3.10 से 6.24%) तक उत्कृष्ट थे।

वीर्य उत्पादन व फ्रीजवाल सांडों का आकारमितीय चरित्र चित्रण
फ्रीजवाल सांडों में (संख्या=133, स्खलनों की संख्या=3006) औसत वीर्य आयतन (मिली.), सांद्रता (मिलियन/मिली.), गतिशीलता (%) व पोस्ट-था गतिशीलता (%) क्रमश% 5-51±0-04] 1142-63±10-32] 53-70±0-38 व 48-81±0-40 थी। इस वर्ष हिमीकृत वीर्य की कुल 245900 मात्राएँ पैदा की गई।

फ्रीजवाल नरों के शारीरिक आकारमितीय गुणों में वक्ष स्थल की परिधि, पश्च परिधि, शरीर की लम्बाई, कन्धों की ऊंचाई, शरीर बैरल का आयतन, बैरल का क्षेत्रफल, अन्डकोशों की माप, श्रोणी माप आदि का मापन किया गया। चार वर्ष की आयु के पश्चात शारीरिक मापदंडों में बढ़वार की दर अस्थिर थीं। तरुण व व्यस्क दोनों ही प्रकार के फ्रीजवाल सांडों में अच्छी कामेच्छा देखी गई यद्यपि कुछ व्यस्क सांडों में कम कामेच्छा (8%) भी देखी गई। सभी तरुण सांडों में अभिक्रिया समय 30 सेकिंड से कम पाया गया। अधिकतर व्यस्क सांडों (88.71%) में अभिक्रिया समय 30 सेकिंड तक था, जबकि 6.99% मामलों में यह 31-61 सेकिंड के बीच था व 4.30% मामलों में यह 60 सेकिंड से ज्यादा था। इस अध्ययन से यह पता चलता है कि कुछ मामलों को छोड़कर अधिकतर मामलों में फ्रीजवाल सांडों ने अच्छी कामेच्छा प्रदर्शित की। जिन फ्रीजवाल सांडांे में वृषणों की त्वचा की मोटाई कम थी (4. 5 मिमी. से कम) उनमें मोटी वृषण त्वचा (4.5 मिमी. या अधिक) वाले सांडों की तुलना में प्रति मिली. वीर्य सान्द्रता (11.11% या अधिक), प्रारंभिक प्रगामी शुक्राणु गतिशीलता (5.19% या अधिक) व प्रति स्खलन शुक्राणु प्राप्ति (11.58% या अधिक) अपेक्षाकृत अधिक (P<0-01) थी।

फ्रीजवाल सांडों में टेस्टोस्टेरोन, ईस्टराडायोल व ल्युटीनाइजिंग हार्मोन के स्तर का आंकलन
अच्छी गुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में जीनएआरएच चुनौती से पहले टेस्टोस्टेरोन स्तर (नैनोग्राम/मिली.) 1-11±0-51 से 2-29± 0-90 के बीच था व घटिया गुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में यह 1-67±0-84 से 2-84±1-19 के बीच था। अच्छी गुणवत्ता व घटिया गुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में टेस्टोस्टेरान स्तर में सामान्य स्तर पर कोई भिन्नता नहीं पाई गई यद्यपि घटिया गुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में जीएनआरएच चुनौती के बाद चरम स्तर प्राप्त करने की अवधि में काफी देरी हुई। इसी प्रकार अच्छी गुणवत्ता व घटियागुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में जीएनआरएच चुनौती के बाद ईस्टराडायोल स्तर में भी कोई सार्थक परिवर्तन नहीं देखा गया।

अच्छी गुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में ल्युटीनाइजिंग हार्मोन का स्तर (नैनोग्राम/मिली.) 0-71±0-44 से 1-27±0-38 के बीच पाया गया। जबकि जीएनआरएच चुनौती से पहले घटिया गुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में यह 0-51±0-81 से 0-96±0-45 के बीच पाया गया। अच्छी गुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में जीएनआरएच चुनौती के बाद 90 मिनटों में ल्युटीनाइजिंग हार्मोन स्तर (20- 93±4-98 नैनोग्राम/मिली.) चरम स्तर पर पहुँच गया जबकि घटिया गुणवत्ता का वीर्य उत्पादन करने वाले सांडों में यह काफी बाद अर्थात् 180 मिनटों के बाद चरम स्तर (¼24-93±4-90 नैनोग्राम/मिली.) पर पहुंचा।

विभिन्न प्रजनन तकनीकों, पोषण व प्रबंधन हस्तक्षेपों द्वारा फ्रीजवाल औसरों की प्रजनन दक्षता में वृद्धि
फ्रीजवाल गायों में व्यक्तिगत खिलाई पिलाई के कारण देहभार वृद्धि 446-80±12-03 ग्रा./दिन पी गई। फ्रीजवाल औसरों ने 641-35±25-33 दिनों में प्रथम मद प्रदर्शित किया व प्रथम मद के समय उनका औसत देहभार 287.92 किग्रा. था।

II. गाय की देशी नस्लों का संरक्षण व आनुवंशिक सुधार
अंगोल नस्ल
प्रजनन योग्य मादाओं की संख्या 799 थी। कुल सात सौ अठाईस (728) कृत्रिम गर्भाधान किये गए, जिनमें से 441 पशुओं ने गर्भधारण किया। औसत गर्भधारण दर 60.57% थी। वर्ष 2013 में कुल 180 बछडियाँ पैदा हुई। वर्ष 2013 में हिमीकृत वीर्य की कुल दस हजार तीन सौ पचास मात्राएँ तैयार की गई तथा इस कार्यक्रम में वीर्य की कुल 2459 मात्राएँ प्रयोग की गई। नस्ल सुधार हेतु अन्य संस्थाओं को हिमीकृत वीर्य की कुल 52711 मात्राएँ बेची गई व वर्ष 2013 के अंत तक हिमीकृत वीर्य की 184375 मात्राएँ उपलब्ध थी। इस कार्यक्रम में अब तक नौ समुच्चयों में कुल 73 सांड प्रयोग किये जा चुके है। विभिन्न समुच्चयों में कुल 9825 कृत्रिम गर्भाधान किये गए। अब तक आठ समुच्चयों से 3808 बछडियाँ उत्पन्न हो चुकी हैं। प्रथम सात समुच्चयों से उत्पन्न एक हजार पांच सौ सात बछडियाँ ब्यांत तक पहुँच चुकी है। जिनमें से 1228 ने अपना प्रथम दुग्धस्रवन काल पूरा कर लिया है।

कांकरेज नस्ल
प्रजनन योग्य मादाओं की संख्या 62 थी जिनमें जर्म प्लाज्म इकाई पर उपस्थित 26 औसरें भी सम्मिलित हैं। एक हजार एक सौ बावन (1152) कृत्रिम गर्भादान किये गए, जिसमें से 590 पशुओं ने गर्भधारण किया। वर्ष 2013 में कुल 187 बछडि़याँ पैदा हुई। औसत गर्भधारण दर 51. 21% थी। आंकड़ा संग्रहण इकाई व जर्म प्लाज्म इकाई के आस पास के गांवों में कुल 3000 प्रजनन योग्य गायों को चिह्नित किया गया। हिमीकृत वीर्य की कुल 31700 मात्राएँ तैयार की गई व इस कार्यक्रम के अंतर्गत परीक्षण समागम हेतु हिमीकृत वीर्य की 2588 मात्राएँ प्रयोग की गई। हिमीकृत वीर्य की 545 मात्राएँ हितधारकों को प्दकपंद ब्वनदबपस व ि।हतपबनसजनतंस त्मेमंतबी 7 ब्मदजतंस प्देजपजनजम वित त्मेमंतबी वद ब्ंजजसम ।ददनंस त्मचवतज 2013.14 बेची गई व वर्ष 2013 के अंत तक हिमीकृत वीर्य की 54640 मात्राएँ उपलब्ध थीं। कुल 4500 कृत्रिम गर्भाधान (प्रथम समुच्चय में 2206 व द्वितीय समुच्चय में 2294) किये गए, जिसमें से 2255 पशुओं ने गर्भधारण किया। औसत गर्भधारण दर 50.11% थी। वर्ष 2013 में कुल 616 बछडि़याँ पैदा हुईं।

गिर नस्ल
प्रजनन योग्य मादाओं की संख्या 55 थी जिनमें जर्म प्लाज्म इकाई पर उपस्थित 5 औसरें (झ2.5 वर्ष) व आंकड़ा संग्रहण इकाई, जूनागढ़ कृषि विश्वविद्यालय, जूनागढ़ पर उपस्थित 213 औसरें भी सम्मिलित हैं। इस कार्यक्रम में द्वितीय समुच्चय में कुल 5 गिर सांड प्रयोग किये जा चुके हैं। इस इकाई में विभिन्न गांवों से कुल 4810 प्रजनन योग्य गायों को चिह्नित किया गया। इसी के साथ-साथ 5 सहयोगी झुंडों से भी लगभग 1240 प्रजनन योग्य गायों को चिह्नित किया गया। प्रथम समुच्चय में 9112 व द्वितीय समुच्चय में 3158 कृत्रिम गर्भाधान किए गए। प्रथम समुच्चय में गर्भधारण दर 49.19% व द्वितीय समुच्चय में गर्भधारण दर 44.49% थी। औसत गर्भधारण दर 47.97% थी। कुल 2655 बछडि़याँ (प्रथम समुच्चय में 2290 व द्वितीय समुच्चय में 365) पैदा हुई। वर्ष 2013 में, कुल 3692 कृत्रिम गर्भाधान किये गए, जिसमें से 1837 पशुओं ने गर्भधारण किया। औसत गर्भधारण दर 49.75% थी। कुल 823 बछडि़याँ पैदा हुईं। इस कर्यक्रम के अंतर्गत वीर्य की 11321 मात्राएँ हिमीकृत की गई व हिमीकृत वीर्य की 5197 मात्राएँ प्रयोग की गई। हिमीकृत वीर्य की 14651 मात्राएँ उपलब्ध थी। हिमीकृत वीर्य की कुल 580 मात्राएँ हितधारकों को बेची गई।

साहीवाल नस्ल
प्रजनन योग्य मादाओं की संख्या 641 थी जिनमें जर्म प्लाज्म इकाई, एन.डी.आई.आई., करनाल पर उपस्थित 132 औसरें, गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा व पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, लुधियाना पर उपस्थित 49 औसरें, जी.एल.एॅफ, हिसार पर उपस्थित 250 औसरें, गौशाला भिवानी पर उपस्थित 129 औसरें व गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर पर उपस्थित 81 औसरें भी सम्मिलित हैं। इस कार्यक्रम में प्रथम समुच्चय में कुल 8 सांड व द्वितीय समुच्चय में 6 सांड प्रयोग किये जा चुके हैं। इस कार्यक्रम के अंतर्गत वीर्य की 24580 मात्राएँ हिमीकृत की गई व हिमीकृत वीर्य की 2290 मात्राएँ परीक्षण समागम हेतु प्रयोग की गई। हिमीकृत वीर्य की कुल 2748 मात्राएँ हितधारकों को बेची गई। वर्ष 2013 के अंत तक हिमीकृत वीर्य की 23895 मात्राएँ उपलब्ध थी।

कुल 1216 कृत्रिम गर्भादान किये गए, जिसमें से 451 पशुओं ने गर्भधारण किया। वर्ष 2013 में कुल 187 बछडि़याँ पैदा हुईं। औसत गर्भधारण दर 37.10% थी। जर्म प्लाज्म इकाई, एन.डीआर.आई., करनाल पर गर्भधारण दर 36.61%, गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा व पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, लुधियाना पर गर्भधारण दर 38.75%, जी.एल.एॅफ, हिसार पर गर्भधारण दर 38.20%, गौशाला भिवानी पर गर्भधारण दर 29.2% व गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर पर गर्भधारण दर 40.34% थी। वर्ष 2013 में, कुल 212 बछडि़याँ पैदा हुईं। कुल 3557 कृत्रिम गर्भाधान किये गए, जिसमें से 467 पशुओं ने गर्भधारण किया।

III. क्षेत्र संतति परीक्षण परियोजना द्वारा संकर गायों का सुधार
गुरु अंगद देव पशु चिकित्सा व पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, लुधियाना
अब तक ग्यारह विभिन्न समुच्चयों में कुल 239 सांड प्रयोग किये जा चुके हैं। इस इकाई पर 14310 वयस्क गायें तथा 5400 प्रजनन योग्य बछडियाँ थी। लुधियाना जिले में 30 कृत्रिम गर्भाधान केन्द्रों पर कृत्रिम गर्भाधान का कार्य किया जा रहा है। इस वर्ष विभिन्न संकर सांडों के वीर्य से कुल 10415 कृत्रिम गर्भाधान किए गए। परीक्षण संाडों के नौ वे समुच्चय से उत्पन्न 45 बछडियों ने प्रथम दुग्धस्रवन में 305 दिन पूरे किए। प्रथम दुग्धस्रवन के 305 दिनों में दुग्ध उत्पादन 3699 किग्रा. था। वर्ष 1993 में अंगीकृत गावों में संकर संतति के प्रथम दुग्धस्रवन में 305 दिनों का औसत दुग्ध उत्पादन 2449.70 किग्राथा जोकि परीक्षण सांडों से प्राप्त उच्च कोटि के वीर्य के कारण वर्ष 2013 में 3699.10 किग्रा. तक पहुँच गया।

केरल पशु चिकित्सा व पशु विज्ञान विश्वविद्यालय, थ्रिस्सूर
बारह विभिन्न समुच्चयों में अब तक दो सौ तेईस सांड प्रयोग किये जा चुके हैं। कुल 98959 कृत्रिम गर्भाधान किये गए तथा 55556 गायों का गर्भधारण का अनुसरण किया गया। जिनमें से 22207 पशुओं ने गर्भधारण किया। औसत गर्भधारण दर 40.4% थी। बारहवें समुच्चय में कुल 3981 कृत्रिम गर्भाधान किये गए। औसत गर्भधारण दर 45.6% थी। विभिन्न समुच्चयों की संततियों के दुग्ध उत्पादन में बढ़ता हुआ रुझान देखा गया व प्रथम समुच्चय में 305 दिनों का दुग्ध उत्पादन 1958 किग्रा. व दसवें समुच्चय में 2681 किग्रा. पाया गया। बारहवें समुच्चय के 28 सांडों से प्राप्त वीर्य का कृत्रिम गर्भाधान हेतु प्रयोग किया गया व 3981 कृत्रिम गर्भाधान किये गए। औसत गर्भधारण दर 45.6% थी। वर्ष भर में उत्पन्न 926 संततियों में 483 मादाएं थीं। तरेसठ मादा संततियों ने अपना पहला दुग्धस्रवन पूरा कर लिया है। प्रथम समुच्चय में प्रथम ब्यांत पर आयु 1136 दिन थी जोकि घट कर दसवें समुच्चय में 917 दिन हो गई। प्रथम दस समुच्चयों से उत्पन्न 1385 बछडि़याँ अपना प्रथम दुग्धकाल पूरा कर चुकी हैं।

बैफ अनुसन्धान विकास फाउंडेशन, उरली कंचन, पुणे
दस विभिन्न समुच्चयों में अब तक दो सौ पंद्रह सांड प्रयोग किये जा चुके हैं। कुल 88652 कृत्रिम गर्भाधान किये गए। कुल 81087 कृत्रिम गर्भाधानों में गर्भधारण का अनुसरण किया गया जिसमें 36850 गर्भधारणों की पुष्टि की गई व 45.5% गर्भाधान दर पाई गई। कुल 10676 बछडि़याँ पैदा हुईं व 3877 बछडि़याँ प्रथम ब्यांत की आयु तक पहुंची। प्रथम आठ समुच्चयों के सांडों से उत्पन्न कुल 2829 बछडि़याँ अपना प्रथम दुग्धस्रवन पूरा कर चुकी हैं। तीन सौ पांच दिन का औसत दुग्ध उत्पादन 2930 किग्रा. से 3094 प्दकपंद ब्वनदबपस व ि।हतपबनसजनतंस त्मेमंतबी 9 ब्मदजतंस प्देजपजनजम वित त्मेमंतबी वद ब्ंजजसम ।ददनंस त्मचवतज 2013.14 किग्रा. हो गया। जनवरी से दिसंबर 2013 के मध्य कुल 5338 कृत्रिम गर्भाधान किये गए। जिनमें 1655 पशु गर्भित हो गए। वर्ष के दौरान औसत गर्भधारण दर 47.3% थी। इस अवधि में कुल 1315 ब्यांत हुए जिसमें 5787 बछडि़याँ पैदा हुईं। कुल 236 मादा संतति प्रथम ब्यांत की आयु तक पहुंची तथा प्रथम ब्यांत पर औसत आयु 925.7 दिन थी। इस वर्ष कुल 164 संततियों ने प्रथम दूधस्रवन पूरा किया तथा 305 दिनों का औसत दुग्ध उत्पादन 3088 किग्रा. था। विगत वर्ष विभिन्न कारणों से 30.5% आंकड़े नष्ट हो गए।

गोविन्द बल्लभ पन्त कृषि एवं प्रोद्योगिकी विश्वविद्यालय, पंतनगर
इस कार्यक्रम के अंतर्गत फ्रीजवाल सांडों के तीन समुच्चय पुर%स्थापित किये जा चुके हैं। प्रथम समुच्चय में दस, दूसरे में छ% व तीसरे समुच्चय में नौ सांड थे। परियोजना में अब तक कुल 6186 कृत्रिम गर्भाधान किये गए, 5650 पशुओं में गर्भधारण का अनुसरण किया गया, 3518 गर्भधारणों की पुष्टि की गई व 62% गर्भाधान दर पाई गई। वर्ष 2013 में कुल 1778 कृत्रिम गर्भाधान किये गए, 1365 कृत्रिम गर्भाधानों में गर्भधारण का अनुसरण किया गया जिसमें 767 बछडि़याँ (दूसरे समुच्चय से 165 व तीसरे समुच्चय से 152) पैदा हुई व मृत्यु व बिक्री के कारण 9 बछडि़यों (तीसरे समुच्चय से) का ह्रास हुआ। विश्वविद्यालय में पांच एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किये गए व क्षेत्र में तीन औसर प्रदर्शन आयोजन किये गए जिसमें क्रमश% 233 व 408 (कुल 641) किसानों ने भाग लिया व कार्यक्रम को समझने में सक्रिय भाग लिया। आंकड़ों का कुल ह्रास 5.93% था जो कि मुख्य रूप से नवजात मृत्यु व पशुओं की बिक्री के कारण था।

गाय व भैसों में स्पर्मेटोगोनियल स्टेम कोशिकाओ का चरित्र चित्रण व विभेदन
कृत्रिम वातावरण में स्पर्मेटोगोनियल कोशिकाओं में बीसीएल6बी की अभिव्यक्ति
एसएससी संवर्धन से प्राप्त कोशिकाओं को निकाला गया तथा उनका संवर्धन की विभिन्न अवस्थाओं (0-4 सप्ताह) पर आरएनए (RNA) विलगन (TRIZOL विधि से) किया गया। cDNA। संस्लेषण किट का प्रयोग करते हुए बक्छ। संस्लेषण के लिए विलगित आरएनए का प्रयोग किया गया। एम्एसीएस (MACS) विधि द्वारा छांटी गई c-Kit+ व CD9$ एसएससी में BCL6b जीन के सम्प्रेषण के लिए मात्रात्मक पीसीआर किया गया। BCL6b जीन के लिए CD9$ एसएससी की अपेक्षाC-Kit+़ कोशिकाओं में सम्प्रेषण अधिक था।

संकर सांडों में घटिया शुक्राणु गुणवत्ता व प्रजनन क्षमता का आनुवंशिक आधार
वीर्य गुणवत्ता आंकड़ों व ग्रोथ हारमोन जीन के मध्य परस्पर सम्बन्ध स्थापित करने के लिए एक अध्ययन पूरा किया गया। इस अध्ययन में अच्छे व घटिया वीर्य उत्पन्न करने वाले संकर फ्रीजवाल सांडों के बीच कोई सम्बन्ध नहीं पाया गया। अक्वापोरिन7 (AQ7) जीन का अच्छे मगर तथा शुक्राणु गतिशीलता वाला वीर्य उत्पन्न करने वाले फ्रीजवाल सांडों के मध्य सार्थक सहसंबंध पाया गया। पीआरएम्1 व पीआरएम् 3 का प्रमाणीकरण किया गया। प्रमाणीकरण कार्य में, पिछले अध्ययन जैसे ही परिणाम सामने आये। अच्छी गुणवत्ता वाले सांडों की अपेक्षा घटिया गुणवत्ता वाले सांडों में पीआरएम्3 का सम्प्रेषण सार्थक नहीं था। खून के नमूनों में GnRHR व AQ7 के प्रमाणीकरण का कार्य पूर्ण किया गया। वीर्य गुणवत्ता विशेषक के साथ सहसंबंध के कारण दोनों जीनों का अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण है। अतः अच्छी गुणवत्ता वाले व घटिया गुणवत्ता वाले सांडों की पहचान बहुत कम आयु पर की जा सकती है और यह कहा जा सकता है कि यह जीने अच्छे व घटिया सांडों के लिए एक जैवसूचक का कार्य कर सकता है। परन्तु इस दिशा में
विभिन्न आयु वर्गों के सांडों में और अधिक प्रमाणीकरण कार्य करने की आवश्यकता है।